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हिमाचल में सेब छोड़कर बागवान करने लगे कीवी, अनार उत्पादन, अध्ययन में खुलासा

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सर्दियों में ठंडक के घंटों में कमी, हिमपात में गिरावट और असमय वर्षा ने खासकर सेब उत्पादन को प्रभावित किया है।

जलवायु परिवर्तन हिमाचल की बागवानी के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभर रहा है। सर्दियों में ठंडक के घंटों में कमी, हिमपात में गिरावट और असमय वर्षा ने खासकर सेब उत्पादन को प्रभावित किया है। कई क्षेत्रों में बागवान अब सेब की खेती छोड़कर कीवी, अनार, पर्सिमोन और अन्य फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। हालांकि, राज्य ने पिछले 53 वर्षों में बागवानी क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। इन वर्षों में राज्य में फल उत्पादन क्षेत्रफल में 433 प्रतिशत और पैदावार में 448 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। बावजूद कई इलाकों के बागवान सेब बागवानी से मुंह मोड़ने लगे हैं।

नौणी विवि के क्षेत्रीय बागवानी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र शरबो किन्नौर के वैज्ञानिकों डॉ. अरुण कुमार ने इस पर एक अध्ययन किया है। उनका अध्ययन में सहयोग दुर्गा प्रसाद भंडारी, बुद्धि राम और दीपिका ने किया है। अध्ययन में बताया गया है कि 1970-71 में जहां 44,329 हेक्टेयर क्षेत्रफल में फलों की खेती होती थी, वहीं 2022-23 में यह बढ़कर 2,36,466 हेक्टेयर हो गया। इसी अवधि में फल उत्पादन 1,48,580 मीट्रिक टन से बढ़कर 8,14,611 मीट्रिक टन हो गया है। फलों की पैदावार में सबसे बड़ा योगदान सेब का रहा है, जो वर्ष 2022-23 में कुल उत्पादन का 82.5 प्रतिशत है। अब सेब बागवान दूसरी फसलों को अपनाने लगे हैं।

अध्ययन में सुझाव दिया गया है कि जलवायु अनुकूल किस्मों को विकसित किया जाना चाहिए।  उच्च घनत्व पौधरोपण, सटीक कृषि तकनीकें जैसे ड्रोन और सेंसर आधारित सिंचाई और शून्य बजट प्राकृतिक को बढ़ाया जा सकता है। इसके अलावा परागण के लिए मधुमक्खियों का उपयोग, जैविक खाद और छंटाई जैसी तकनीके बागवानों की आमदनी में 15-20 प्रतिशत तक की वृद्धि कर सकती हैं। प्राकृतिक खेती, सटीक कृषि और जलवायु अनुकूल किस्मों को अपनाया गया तो आने वाले दशक में उत्पादकता में 15-30 प्रतिशत तक की वृद्धि संभव हो सकती है।

सेब उत्पादन का क्षेत्र और उपज बढ़ने के बावजूद 53 वर्षों में सेब की उत्पादकता में काफी अस्थिरता देखी गई। अध्ययन में बताया गया है कि जलवायु परिवर्तन, कीट रोग और प्रबंधन तकनीकों की कमी के कारण सेब की उत्पादकता में सालाना 47.2 प्रतिशत तक का उतार-चढ़ाव हुआ है। पाला गिरने, ओलावृष्टि और असमय बारिश के चलते उत्पादन में 20-30 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई। प्राकृतिक खेती, जैविक खेती, एकीकृत पोषण प्रबंधन, एकीकृत कीट प्रबंधन, छंटाई और परागण प्रबंधन जैसी तकनीकों को अपनाने से उत्पादकता में 15-20 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई।

वर्ष 1980 और 1990 के दशक में बागवानी विकास योजना में बगीचों और सिंचाई के लिए सब्सिडी मिलने से क्षेत्रफल और उत्पादन दोनों में तेजी से वृद्धि हुई। वहीं, 2000 के दशक में बाजार हस्तक्षेप योजना और मिशन फॉर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर जैसी योजनाओं से किसानों की आमदनी को सहारा मिला। अध्ययन के अनुसार राज्य में अन्य फल प्रजातियों जैसे नींबू वर्गीय फल, आम, लीची, अमरूद, अखरोट और बादाम का क्षेत्र भी तेजी से बढ़ा है। विशेषकर निचले इलाकों कांगड़ा, बिलासपुर और ऊना में आम, लीची और संतरा जैसी फसलों की खेती का विस्तार हुआ है। हालांकि, इन उपोष्णकटिबंधीय और नींबू वर्गीय फलों की उत्पादकता अभी भी कम है।

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