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Himachal News: एचपीयू ने रचा इतिहास, जनजातीय बोलियों का 25 हजार शब्दों वाला पहला शब्दकोश तैयार

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एचपीयू शिमला ने विभिन्न जनजातीय बोलियों का त्रिभाषी शब्दकोश तैयार किया है। यह शब्दकोश केवल बोलियों का संकलन नहीं बल्कि सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने का प्रयास भी है। पढ़ें पूरी खबर...

हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के जनजातीय अध्ययन विभाग ने दस वर्षों की लंबी शोध प्रक्रिया के बाद प्रदेश की विभिन्न जनजातीय बोलियों का त्रिभाषी शब्दकोश तैयार किया है। इस शब्दकोश में 25 हजार से अधिक शब्दों का संकलन किया गया है, जिन्हें स्थानीय भाषाओं से हिंदी और अंग्रेजी में अनुवादित किया गया है।

यह शब्दकोश केवल बोलियों का संकलन नहीं बल्कि सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने का प्रयास भी है। प्रदेश के कई दुर्गम और जनजातीय क्षेत्रों में बोली जाने वाली बोलियां आधुनिकता और बदलती जीवनशैली के प्रभाव से धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही हैं। नई पीढ़ी के बीच इन बोलियों का प्रयोग घट रहा है। ऐसे समय में यह प्रयास भाषाई अस्मिता को बचाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। शब्दकोश तैयार करने के लिए विभाग की टीम ने प्रदेश के विभिन्न जनजातीय क्षेत्रों में व्यापक फील्ड सर्वे किया।

शोधकर्ताओं ने गांव-गांव जाकर बुजुर्गों, लोकगायकों, पारंपरिक ज्ञान रखने वाले व्यक्तियों और स्थानीय समुदायों से संवाद स्थापित किया। मौखिक परंपरा में प्रचलित शब्दों, लोक कथाओं, कृषि, पशुपालन, पर्व-त्योहार और रीति-रिवाजों से जुड़े शब्दों को सावधानीपूर्वक दर्ज किया गया। शब्दकोश में चंबा और पांगी घाटी, लाहौल, कुल्लू, सोलन, सिरमौर सहित अन्य जनजातीय क्षेत्रों में बोलियों के शब्द शामिल किए गए हैं। कई ऐसे शब्द भी दर्ज किए गए हैं जिनका प्रयोग अब सीमित रह गया है और जो केवल बुजुर्ग पीढ़ी की स्मृतियों में सुरक्षित थे। दस वर्षों तक चले इस प्रकल्प में भाषाविज्ञान, लोकसंस्कृति और इतिहास के विशेषज्ञों ने संयुक्त रूप से कार्य किया। प्रत्येक शब्द के अर्थ, उच्चारण और संदर्भ को प्रमाणिक बनाने के लिए कई स्तरों पर जांच की गई। अनुवाद प्रक्रिया में यह सुनिश्चित किया गया कि मूल शब्द का भावार्थ सुरक्षित रहे।

शिक्षा और शोध को मिलेगा लाभ
विश्वविद्यालय के जनजातीय अध्ययन विभाग के अध्यक्ष चंद्र मोहन ने बताया कि यह त्रिभाषी शब्दकोश विद्यार्थियों, शोधार्थियों और भाषा-अध्येताओं के लिए उपयोगी सिद्ध होगा। जनजातीय अध्ययन, लोक साहित्य, समाजशास्त्र और मानवशास्त्र से जुड़े शोध कार्यों में इसे संदर्भ सामग्री के रूप में प्रयोग किया जा सकेगा। यदि स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी बनी रही तो अन्य लुप्त प्राय: बोलियों का भी दस्तावेजीकरण किया जा सकेगा। दस वर्षों की सतत मेहनत से तैयार यह शब्दकोश केवल एक पुस्तक नहीं बल्कि हिमाचल की जनजातीय आत्मा को सहेजने का प्रयास है। बदलते समय में जब स्थानीय भाषाएं अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं तब यह पहल सांस्कृतिक संरक्षण की दिशा में मजबूत आधार साबित हो सकती है।

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