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हिमाचल से आई ऐसी खोज, जो बदल सकती है करोड़ों मरीजों की जिंदगी! जानें पूरी खबर

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भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मंडी की एआई आधारित संपर्क रहित जांच तकनीक को पेटेंट मिला है। यह तकनीक महज 50 माइक्रो लीटर सीरम की बूंद का विश्लेषण कर लिवर और किडनी संबंधी बीमारियों का आकलन कर सकती है।

कल्पना कीजिये, लिवर या किडनी की बीमारी का पता लगाने के लिए भविष्य में बार-बार खून के नमूने देने की जरूरत न पड़े। सिर्फ एक बूंद से कुछ ही मिनटों में बीमारी का शुरुआती संकेत मिल जाए। इसी सोच को हकीकत में बदलने की दिशा में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मंडी के वैज्ञानिकों ने सफलता हासिल की है। संस्थान की एआई आधारित संपर्क रहित जांच तकनीक को पेटेंट मिला है। यह तकनीक महज 50 माइक्रो लीटर सीरम की बूंद का विश्लेषण कर लिवर और किडनी संबंधी बीमारियों का आकलन कर सकती है। इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि जांच के दौरान सीरम की बूंद किसी टेस्ट ट्यूब, कांच की स्लाइड या अन्य सतह के संपर्क में नहीं आती। अकूस्टिक लेविटेशन तकनीक से बूंद को हवा में स्थिर रखा जाता है।

इसके बाद स्पेक्ट्रोफोटोमेट्रिक विश्लेषण और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की मदद से बिलीरुबिन का स्तर मापा जाता है और मशीन लर्निंग मॉडल संभावित लिवर व किडनी रोगों का संकेत देता है। इससे नमूने के दूषित होने का खतरा कम होगा और बेहद कम मात्रा में भी विश्वसनीय जांच संभव हो सकेगी। शोधकर्ताओं के अनुसार तकनीक का प्रयोगशाला स्तर पर सफल परीक्षण पूरा हो चुका है। अब इसका कार्यशील प्रोटोटाइप विकसित किया जा रहा है। भविष्य में इसे अस्पतालों, क्लीनिकल लैब, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं में इस्तेमाल किया जा सकेगा। खासकर दूरदराज के इलाकों में जहां अत्याधुनिक जांच सुविधाएं सीमित हैं, वहां यह तकनीक मरीजों के लिए काफी उपयोगी साबित हो सकती है। पेटेंट के लिए आवेदन 24 मई 2025 को किया गया था और 29 अप्रैल 2026 को इसे मंजूरी मिल गई। 

इस नवाचार में देओकृष्ण कुमार चौधरी, योगेश दासगांवकर, डॉ. दुबे धीरज प्रकाशचंद, डॉ. राधे श्याम शर्मा और डॉ. रविंद्र नाइक बुक्के ने योगदान दिया है। परियोजना को आईआईटी मंडी कैटलिस्ट के निद्धि प्रयास कार्यक्रम का सहयोग मिला है। अब शोध दल इसके व्यावसायीकरण के लिए उद्योग साझेदारों की तलाश कर रहा है, जबकि इस पर आधारित शोधपत्र भी तैयार किया जा रहा है।

तकनीक का प्रयोगशाला स्तर पर सफल सत्यापन हो चुका है। वर्तमान में इसका कार्यशील प्रोटोटाइप विकसित किया जा रहा है। भविष्य में इसे अस्पतालों, क्लीनिकल लैब, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और पॉइंट ऑफ केयर डायग्नोस्टिक केंद्रों में उपयोग के लिए विकसित करने की योजना है।-डॉ. राधे श्याम शर्मा, शोधकर्ता, आईआईटी मंडी

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