

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को बागवानी विकास सोसायटी (एचपीएचडीएस) के माध्यम से नियुक्त अनुबंध कर्मचारियों को दो साल पूरा होने पर नियमित करने का आदेश दिया है। अदालत ने इसके साथ ही कर्मचारियों के वेतन-भत्तों का लाभ भी जारी करने को कहा है।
न्यायाधीश संदीप शर्मा की अदालत ने कहा कि जिस सोसायटी के अंतर्गत इन कर्मचारियों को नियुक्त किया गया है वह पूरी तरह से सरकार के नियंत्रण में है। इसलिए कर्मचारियों को नियमितीकरण के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता है। अदालत ने नितिन ठाकुर बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य सहित 68 अन्य संयुक्त याचिकाओं पर साझा फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा कि सभी उद्देश्यों और प्रयोजनों के लिए याचिकाकर्ता राज्य के नियंत्रण में हैं और इसलिए नियमितीकरण से संबंधित लाभकारी सरकारी नीतियां उन पर भी लागू होती हैं।
कोर्ट ने कहा कि यह कॉर्पोरेट से पर्दा उठाने का एक उपयुक्त मामला है क्योंकि इस सोसाइटी का निर्माण और संचालन सरकार ने अपनी परियोजनाओं को क्रियान्वित करने के लिए किया था। कोर्ट ने कहा कि यद्यपि याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति सोसायटी के माध्यम से अनुबंध पर की गई थी, फिर भी वे बागवानी निदेशालय, एचपीएमसी, कृषि विपणन बोर्ड और बागवानी विश्वविद्यालयों में कार्य कर रहे थे। हिमाचल प्रदेश सरकार सोसायटी पर पूर्ण नियंत्रण रखती है, क्योंकि इसका स्वामित्व, नियंत्रण और वित्तपोषण पूरी तरह से राज्य सरकार के पास है। विज्ञापन के जरिए ही पदों की भर्ती विभाग द्वारा ही की गई थी और नियुक्तियों को उच्च अधिकारियों द्वारा अनुमोदित किया गया था।
उल्लेखनीय है कि विश्व बैंक परियोजना के कार्य को धरातल पर अमलीजामा पहनाने के लिए वर्ष 2016 में हिमाचल प्रदेश बागवानी विकास समिति का गठन किया गया। विश्व बैंक परियोजना का काम 2016 से 2036 तक निर्धारित था। लेकिन हिमाचल प्रदेश राज्य सरकार ने 31 अक्टूबर 2024 को प्रोजेक्ट का काम बंद होने का हवाला देते हुए इनकी सेवाओं को समाप्त करने को कहा था। लेकिन इससे पहले ही याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट का रुख किया और याचिकाएं दायर कीं। इसके साथ ही 2024 से अभी तक कर्मचारियों का वेतन भी बंद कर दिया था। प्रोजेक्ट के तहत प्रदेश में करीब 531 कर्मचारी कार्यरत हैं जिनमें से 290 कर्मचारी अनुबंध पर रखें गए थे।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने दलील दी कि नियमितीकरण से इन्कार करना शोषण और कृत्रिम भेदभाव के समान है। उन्होंने पहले के ऐसे मामलों का हवाला दिया जहां हिम ऊर्जा, सर्व शिक्षा अभियान और प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन सोसाइटी जैसी समान संस्थाओं के कर्मचारियों को समाहित किया गया था और बाद में नियमित किया गया था।
वहीं राज्य सरकार ने याचिकाकर्ताओं को हिमाचल प्रदेश सरकार ने नियमितीकरण नीति का लाभ देने से यह कहकर मना कर दिया गया कि वे प्रतिवादी-राज्य (सरकार) के कर्मचारी नहीं हैं, बल्कि उनका संबंध सोसाइटी से है। याचिकाकर्ता विश्व बैंक द्वारा वित्त पोषित परियोजनाओं के अंतर्गत कार्यरत सोसायटी के कर्मचारी हैं। उनकी सेवाएं परियोजनाओं के साथ ही समाप्त हो जाती हैं। अदालत ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि उन्हें केवल इसलिए समानता से वंचित नहीं किया जा सकता क्योंकि उन्हें एक सोसाइटी के अंतर्गत कार्यरत दिखाया गया है।
याचिकाकर्ताओं को विभिन्न पदों पर, जिनमें सहायक अभियंता, कनिष्ठ अभियंता (सिविल, इलेक्ट्रिकल, मैकेनिकल, इंस्ट्रुमेंटेशन), ड्राफ्ट्समैन, फैसिलिटेटर, सर्वेयर, तकनीकी फैसिलिटेटर, प्रोक्योरमेंट ऑफिसर, प्रोग्रामर (एमए प्रोक्योरमेंट, एमए अकाउंट्स), फार्म मैनेजर, सहायक फार्म मैनेजर, और कार्यालय सहायक (प्रबंधन/आईटी) शामिल हैं, अनुबंध के आधार पर नियुक्ति दी गई थी।





