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कम्यूटेशन अवधि पर भ्रम, हिमाचल हाईकोर्ट ने सरकार को स्पष्ट करने के दिए आदेश

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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि सरकार अगली सुनवाई में स्पष्ट करें कि कम्यूटेशन की अवधि कितनी है। पढ़ें पूरी खबर...

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कम्यूटेशन मामलों में राज्य सरकार से स्पष्टीकरण मांगा है। एक याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि सरकार अगली सुनवाई में स्पष्ट करें कि कम्यूटेशन की अवधि कितनी है। इस मामले में न्यायाधीश विवेक सिंह और न्यायाधीश राेमेश वर्मा की खंडपीठ में सात जनवरी को सुनवाई होगी। पहले इस मामले की सुनवाई हिमाचल हाईकोर्ट के तत्कालीन कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान की खंडपीठ कर रही थी।

सोमवार को याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि राज्य सरकार कम्यूटेशन का पैसा पेंशनरों से 15 साल तक लेती है, जबकि पैसे की रिकवरी 12 साल में पूरी हो जाती है। 15 साल तक पैसे की रिकवरी करना और लेना सीसीएस पेंशन रूल्स का उल्लंघन है। अन्य राज्यों में कम्यूटेशन की अवधि 12 और कुछ में 13 वर्ष निर्धारित की गई है। वहीं, सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि इस संबंध में उच्च कमेटी के साथ विचार-विमर्श कर उसकी राय लेना जरूरी है।

सरकार ने अदालत से मामले में स्पष्टीकरण के लिए अतिरिक्त समय मांगा, जिसे अदालत ने स्वीकार कर दिया। अदालत में इससे पहले भी कम्यूटेशन में साधारण ब्याज लिया जाता है या चक्रवृद्धि ब्याज इस पर स्थिति स्पष्ट करने को कहा था। अदालत में महाधिवक्ता ने उस समय बताया था कि सेवानिवृत्त कर्मचारियों से जो कम्यूटेशन में ब्याज लिया जाता है, वह साधारण ब्याज है या चक्रवृद्धि ब्याज, इसकी जानकारी केवल केंद्र सरकार दे सकती है।


हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने जिला कलेक्टर कांगड़ा की ओर से 4 फरवरी 2025 को पारित उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें याचिकाकर्ता को मोतमीन के पद से हटा दिया गया था। इस आदेश के बाद तहसीलदार धर्मशाला को मंदिर का प्रबंधक नियुक्त किया गया था। याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता ने तर्क दिया कि प्रतिवादी अधिकारियों के पास मोतमीन को हटाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। उन्होंने हिमाचल प्रदेश हिंदू लोक धार्मिक संस्थान और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम 1984 का हवाला दिया और बताया कि क्योंकि मंदिर बाबा सिद्ध गौरिया गांव सिद्धबाड़ी तहसील धर्मशाला इस अधिनियम की अनुसूची-एक में शामिल नहीं है। इसलिए इस अधिनियम के प्रावधान इस मंदिर पर लागू नहीं होते हैं।

न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने इस बात पर सहमति व्यक्त की कि चूंकि मंदिर 1984 अधिनियम की अनुसूची 1 में शामिल नहीं है, इसलिए अधिनियम के प्रावधान इस पर लागू नहीं होते हैं। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि 1984 अधिनियम के तहत निर्धारित प्राधिकारी इस मंदिर या इसके मोतमीन पर अधिनियम की ओर से प्रदत्त किसी भी शक्ति का प्रयोग नहीं कर सकते। न्यायालय ने कहा कि मंदिर को एक संपत्ति के रूप में माना जाना चाहिए और यदि किसी व्यक्ति को मोतमीन के कार्यों से कोई शिकायत है, तो उसे सिविल कोर्ट का दरवाजा खटखटाना चाहिए था। यह अवलोकन इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस मामले में मोतमीन याचिकाकर्ता के भतीजे (बहन के बेटे) ने शिकायत दर्ज कराई थी।

राज्य की ओर से कलेक्टर के कार्यों को सही ठहराने के लिए दिए गए एक संचार और दिए गए निर्णय पर न्यायालय ने टिप्पणी की और कहा कि मुख्य आयुक्त (मंदिर)-सह-सचिव की ओर से जारी किए संचार जैसे दस्तावेज, उपायुक्त को वे शक्तियां प्रदान नहीं कर सकते जो उन्हें वैधानिक रूप से प्राप्त नहीं हैं। इसके अलावा, लीला दत्त बनाम देवी दयाल मामले का निर्णय पक्षों तक सीमित था और इसे सामान्य निर्णय के रूप में नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब किसी प्राधिकरण के पास धार्मिक संस्थान के मामलों में हस्तक्षेप करने का क्षेत्राधिकार न हो।

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