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हिमाचल प्रदेश के जंगलों में हो रहा अवैध और वैध दोनों तरह का पेड़ कटान अब आपदा को न्योता दे रहा है। पहाड़ों की मिट्टी को थामे रखने वाले हरे-भरे पेड़ लगातार घट रहे हैं, जिससे भूस्खलन, बाढ़ और बादल फटने की घटनाएं और गंभीर हो रही हैं।

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हाल ही में भारी बारिश के बाद रावी-ब्यास समेत कई नदियों में बहकर आए हजारों टन पेड़ों के अवशेषों ने जंगलों की दुर्दशा और वन कटान की सच्चाई को उजागर कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर संज्ञान लिया है और प्रथम दृष्टया इसे अवैध कटान माना है।

विशेषज्ञों का कहना है कि विकास परियोजनाओं और सड़कों के निर्माण के नाम पर पेड़ों की अंधाधुंध कटाई हो रही है, जबकि नए पौधे लगाने की प्रक्रिया बेहद धीमी है। पर्यावरण कार्यकर्ताओं का आरोप है कि अवैध कटान की जांच गंभीरता से नहीं की जा रही और छोटे कर्मचारियों को ही बलि का बकरा बनाया जा रहा है।

शोधकर्ताओं के अनुसार पंडोह डैम और रावी नदी में लकड़ियों का जखीरा इस ओर इशारा करता है कि मामला गंभीर है और जांच जरूरी है। पर्यावरणविद मानते हैं कि वन क्षेत्र घटने से आपदा का खतरा और बढ़ेगा।

वन विशेषज्ञों का सुझाव है कि कटान पर सख्ती के साथ-साथ सामुदायिक स्तर पर पौधरोपण और ग्रीन कवर बढ़ाने की पहल होनी चाहिए, तभी आपदाओं का खतरा कम होगा।\

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