शिमला/रामपुर: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने प्रशासनिक तबादलों में पारदर्शिता और निष्पक्षता पर जोर देते हुए कहा है कि किसी “चहेते” अधिकारी को एडजस्ट करने के लिए की गई कार्रवाई संविधान प्रदत्त अधिकारों का उल्लंघन है। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रशासनिक शक्तियों का मनमाना उपयोग स्वीकार्य नहीं है।
न्यायमूर्ति अजय मोहन गोयल की अदालत ने यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई के दौरान की, जिसमें रामपुर उपमंडल के ननखड़ी में तैनात विषय विशेषज्ञ (एसएमएस हॉर्टिकल्चर) के तबादले को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ता को 9 दिसंबर को डोडरा क्वार स्थानांतरित कर दिया गया था, जबकि उन्हें ननखड़ी में कार्यभार संभाले मात्र सात महीने ही हुए थे। इससे पहले वे रोहड़ू में तीन वर्ष का कार्यकाल पूरा कर चुके थे।
“जनहित” का दावा खारिज
राज्य सरकार ने अदालत में दलील दी कि तबादला जनहित में किया गया है। हालांकि, अदालत ने पाया कि फाइल में ऐसा कोई ठोस कारण दर्ज नहीं था, जिससे जनहित का आधार सिद्ध हो सके। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि जिन निजी प्रतिवादियों को ननखड़ी भेजा जा रहा था, उनका तबादला बिना टीटीए (यात्रा भत्ता) के किया गया, जो इस बात का संकेत है कि उनका स्थानांतरण विभागीय आवश्यकता नहीं, बल्कि व्यक्तिगत अनुरोध पर हुआ था।
अनुच्छेद 14 और 16 का हवाला
अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लेख करते हुए कहा कि समानता और मनमानी एक-दूसरे के विपरीत हैं। राज्य की हर कार्रवाई निष्पक्ष, पारदर्शी और वैध सिद्धांतों पर आधारित होनी चाहिए।
कोर्ट ने यह भी कहा कि भले ही क्लास वन अधिकारियों का कोई निश्चित कार्यकाल निर्धारित नहीं होता, लेकिन सात महीने का कार्यकाल किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं माना जा सकता।
तबादला आदेश रद्द
अदालत ने 9 दिसंबर को जारी तबादला आदेश को रद्द करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को ननखड़ी में ही उचित अवधि तक सेवाएं जारी रखने दी जाएं।
इस फैसले को प्रशासनिक पारदर्शिता और कर्मचारियों के संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।








